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देव दिवाली क्या है? जानें पूजा विधि व कथा

देव दिवाली क्या है तथा जानें पूजा विधि व कथा

क्या आपने कभी देव दिवाली नामक पर्व के बारें में सुना है? अगर नहीं तो आज वेद संसार आपको इस खास पर्व देव दिवाली के बारे में विस्तार से बताने जा रहा है जो कुछ इस प्रकार है –

दरअसल, हमारे पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दिवाली के ठीक 15 दिन बाद देव दिवाली का पर्व मनाया जाता है। बता दें कि यह देव दिवाली माता गंगा की पूजा के लिए मनाई जाती है। कहते हैं कि कार्तिक माह के पूरे चांद के दिन यानि कि पूर्णिमा के दिन देव दिवाली मनाने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है।

वहीं, हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस दिन महादेव धरती पर आते हैं। इस खास पर्व की धूम सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश के वाराणसी राज्य में देखने को मिलती है।

वाराणसी क्यों कहलाती है महादेव की नगरी

आप में से बहुत लोग यह बात नहीं जानते होंगे कि वाराणसी को महादेव यानि कि भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। देव दिवाली वाले दिन भोलेनाथ के सभी भक्त एक साथ माता गंगा के घाट पर लाखों दीए जलाकर इस उत्सव को धूम-धाम के साथ मनाते हैं।

वहीं, मान्यताओं के अनुसार इस खास दिन काशी के घाटों पर सभी देव आसमान से उतरकर भगावन भोलेनाथ की जीत की खुशी में दिवाली का त्योहार मनाते हैं और देवों के कारण मनायी जाने वाली इस दिवाली को देव दिवाली कहा जाता है। इसी के साथ काशी के रविदास घाट से लेकर राजघाट तक लाखों दीए जलाए जाते हैं। यही नहीं, गंगा के जल पर बहते दीए एक अद्धभुद नजारे की अनुभूति करवाते हैं जिसकी जितनी तारिफ की जाए कम होगी।

देव दिवाली की पूजा विधि

देव दिवाली की पूजा विधि

• सबसे पहले इस दिन आपको गंगा में स्नान करना चाहिए।

• शाम के समय भगवान गणेश की आरती के साथ पूजा की शुरुआत करें।

• इस खास दिन सभी लोग अपने घरों के मंदिर, दरवाजे और साथ ही तुलसी के पौधे के सामनें दीपक अवश्य जलाए।

देव दिवाली के दिन क्या होता है

देव दिवाली के दिन क्या होता है

देव दिवाली के शुभ दिन कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। गंगा के सभी घाटों को लाखों दीयों से सजाया जाता है और लोग घाटों की सुंदरता को देखने के लिए नांव से गंगा की सैर करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि देव दिवाली का आकर्षण ही हजारों यात्रियों को काशी की ओर कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपनी ओर खींच लेता है।

बताते चलें कि प्रदोष काल में की जाने वाली देव दिवाली की पूजा के दिन माता तुलसी के विवाह की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और उनकी पूजा के साथ दीपदान करने की भी मान्यता है।

दोस्तों अगर मौका मिले तो देव दिवाली के समय वाराणसी ज़रूर जाएं और खूबसूरत दीयों से सजी गंगा नदी , जो किसी का भी मनमोह लें उसका आनंद उठाएं और यहां भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करें। अगर आप भी एक खुशहाल ज़िंदगी की चाह रखते हैं तो देव दिवाली को सच्चे मन और पूरे पूजा विधि के साथ मनाएं।

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