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आमलकी एकादशी क्या है, जानें व्रत कथा और पूजा विधि

आमलकी एकादशी की व्रत कथा

आमलकी एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को कहते हैं। आमलकी का अर्थ है आंवला और आंवला को शास्त्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित है और इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है।

आमलकी एकादशी की व्रत कथा

एक बार की बात है जब मांधाता बोले कि हे वशिष्ठजी! यदि आप मुझ पर कृपा करना चाहते हैं तो किसी ऐसे व्रत की कथा कहे जिससे मेरा कल्याण हो। ऐसे में महर्षि वशिष्ठ बोले कि हे राजन्, सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाले आमलकी एकादशी के व्रत का मैं वर्णन करता हूं।

यह खास एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में होती है और इस व्रत को करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और इस व्रत का फल एक हजार गौदान के फल के बराबर भी होता है।

वहीं, पौराणिक कथा के अनुसार एक वैदिश नाम का नगर था, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आनंद सहित रहते थे। उस नगर में सदैव वेद ध्वनि गूंजा करती थी तथा पापी, दुराचारी तथा नास्तिक उस नगर में कोई नहीं था और उस नगर में चैतरथ नाम का चन्द्रवंशी राजा राज्य किया करता था। जो बहुत ही विद्वान तथा धर्मी था। दिलचस्प बात यह है कि उस नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र व कंजूस नहीं हुआ करता था। वहां, सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और आबाल-वृद्ध स्त्री-पुरुष एकादशी का व्रत किया करते थे।

एक समय आया जब फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा, प्रजा तथा बाल-वृद्ध सबने खुशी खुशी व्रत किया और राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर पूर्ण कुंभ स्थापित करके धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से धात्री (आंवले) का पूजा करने लगे और उनकी स्तुति पढ़ने लगे।

आमलकी एकादशी व्रत की पूजा विधि

आमलकी एकादशी व्रत अगर आप करने जा रहे हैं, तो इस व्रत के पहले दिन व्रती को दशमी की रात्रि में एकादशी व्रत के साथ भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए सोना चाहिए।

आमलकी एकादशी व्रत के शुभ दिन सुबह सुबह नहा लें और फिर भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि “मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रख रहा/रही हूं… मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए श्रीहरि मुझे अपनी शरण में रखें”

अब इसके बाद आप नीचे बताए गए मंत्र पढ़ें और संकल्प लें –

मम कायिकवाचिकमानसिक सांसर्गिकपातकोपपातकदुरित क्षयपूर्वक
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्तयै श्री परमेश्वरप्रीति
कामनायै आमलकी एकादशी व्रतमहं करिष्ये

भगवान विष्णु की पूजा के बाद पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले वृक्ष के चारों ओर की भूमि को अच्छे से साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें। वहीं, पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें और फिर इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें। कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप याद से जलाएं।

साथ ही कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और उसे वस्त्र पहनाएं। अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार यानी कि परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें। यही नहीं, रात्रि में भगवत कथा व भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। ध्यान रहें कि द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन ज़रूर करवाएं और उन्हें दक्षिणा भी दें और साथ ही परशुराम की मूर्तिसहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें।

गौरतलब है कि इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके आप अन्न व जल को ग्रहण कर सकते हैं।

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