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भगवान शिव का एक अंग पीठ है केदारनाथ, जानें बाकी अंग हैं कहां

भगवान शिव का एक अंग पीठ है केदारनाथ

भारत की छोटी कश्मीर कहलाने वाला राज्य उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। बता दें कि यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल स्थित हैं। यूं तो सारी दुनिया में भगवान शिव के करोड़ों मंदिर है, लेकिन उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि माना जाता हैं।

भगवान शिव ने अपने महिषरूप अवतार में पांच अंग, पांच अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए थे। जिन्हें मुख्य केदारनाथ पीठ के अतिरिक्त चार और पीठों सहित पंच केदार कहा जाता है। आज वेद संसार आपको बताने जा रहा है भगवान शिव के पंच केदारों के बारे में

केदारनाथ

इसे मुख्य केदारपीठ माना जाता है। यह पंच केदार में से प्रथम है। वहीं, पुराणों की मानें तो महाभारत का युद्ध खत्म होने पर अपने ही कुल के लोगों का वध करने के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वेदव्यास जी की आज्ञा से पांडवों ने यहीं पर भगवान शिव की उपासना की थी। तब जाकर भगवान शिव ने उनकी तपस्या से खुश होकर महिष अर्थात बैल रूप में दर्शन दिये थे और उन्हें पापों से मुक्त किया था। तब से महिषरूपधारी भगवान शिव का पृष्ठभाग यहां शिलारूप में स्थित है।

केदारनाथ कब जाएं

यहां जानें के लिए सबसे अच्छा महीना अप्रैल से अक्टूबर का समय माना जाता है। बता दें कि इस बीच बारीश के दिनों में यात्रा भूल से भी न करें।

केदारनाथ कैसे पहुंचे

आपको बता दें कि केदारनाथ जाने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है। हरिद्वार से आगे का रास्ता सड़क मार्ग से तय किया जाता है। वहीं, केदारनाथ की चढ़ाई बहुत कठिन मानी जाती है, कई लोग तो पैदल भी जाते हैं। केदारनाथ के लिए नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून है।

मध्यमेश्वर

मध्यमेश्वर

इन्हें मदमहेश्वर के नाम से भी जाना जाता हैं। यह ऊषीमठ से 18 मील दूरी पर है। यहां महिषरूपधारी भगवान शिव की नाभि शिवलिंग रूप में स्थित है।  पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान शिव ने अपनी मधुचंद्र रात्रि यही पर मनाई थी। कहते हैं कि यहां के जल की कुछ बूंदे ही मोक्ष के लिए पर्याप्त मानी जाती है।

मध्यमेश्वर कब जाएं

इस मंदिर में जाने के लिए सबसे अच्छा समय गर्मी का मौसम माना जाता है। मुख्य रूप से यहां की यात्रा मई से अक्टूबर के बीच करना अच्छा माना जाता है।

मध्यमेश्वर कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग – उखीमठ से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 196 कि.मी. की है। उखीमठ से उनीअना जाकर, वहां से मध्यमेश्वर की यात्रा की जा सकती है।

रेल मार्ग – उखीमठ से सबसे पास ऋषिकेश का रेल्वे स्टेशन है। इसकी दूरी 181 कि.मी. है। उखीमठ से उनीअना जाकर, वहां से मध्यमेश्वर की यात्रा की जाती है।

सड़क मार्ग – मध्यमेश्वर जाने के लिए सड़क मार्ग दिल्ली से होकर जाता है। दिल्ली से पहले उनिअना जाना पड़ता है। वहां से मध्यमेश्वर की दूरी मात्र 21 कि.मी. है।

तुंगनाथ

केदारनाथ से बद्रीनाथ जाते समय रास्ते में यह क्षेत्र पड़ता है। कहते हैं कि यहां पर भगवान शिव की भुजा शिवलिंग के रूप में स्थित है। यही नहीं, कहा यह भी जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वयं पांडवों ने ही करवाया था। तुंगनाथ शिखर की चढ़ाई उत्तराखंड की यात्रा की सबसे ऊंची चढ़ाई कही जाती है।

तुंगनाथ कब जाएं

यहां जाने के लिए सबसे अच्छा समय है मार्च से अक्टूबर के बीच।

तुंगनाथ कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग – हरिद्वार से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 34.1 कि.मी. की है। हरिद्वार से किसी भी साधन द्वारा देहरादून तक जा कर वहां से तुंगनाथ की यात्रा की जा सकती है।

रेल यात्रा – वहीं, तुंगनाथ के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार को माना जाता है, जो लगभग सभी बड़े स्टेशनों से जुड़ा हुआ है।

सड़क यात्रा – तुंगनाथ पहुंचने के लिए हरिद्वार से ही सड़क मार्ग का प्रयाग भी किया जा सकता है।

रुद्रनाथ

यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव का मुख स्थित हैं। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखाई देता है, पर यह एक गुफा में स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग बेहद दुर्गम है। ध्यान रहे कि यहां पंहुचने का एक रास्ता हेलंग (कुम्हारचट्टी) से भी होकर जाता है। रुद्रनाथ कब जाएं – रुद्रनाथ जाने के लिए सबसे अच्छा समय गर्मी और वसंत का मौसम है।

रुद्रनाथ कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग – हरिद्वार से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 258 कि.मी. की है। यहां तक हवाई मार्ग से पहुंचने के बाद सड़क मार्ग से रुद्रनाथ की यात्रा भी आप आराम से कर सकते हैं।

रेल मार्ग – वहीं, ऋषिकेश तक रेल माध्यम से पहुंचा जा सकता है, उसके बाद सड़क मार्ग की मदद से कल्पेश्वर जा सकते हैं।

सड़क मार्ग – रुद्रनाथ जाने के लिए ऋषिकेश, हरिद्वार, देहरादून से कई बसे चलती रहती हैं।

कल्पेश्वर

यह पंच केदार का पांचवा क्षेत्र माना जाता है। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। अलखनन्दा पुल से 6 मील पार जाने पर यह स्थान आता है। इस स्थान को उसगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां के गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाता है।

कल्पेश्वर कब जाएं

बता दें कि कल्पेश्वर जाने के लिए गर्मी के मौसम में मार्च से जून के बीच और वंसत के मौसम में जुलाई से अगस्त का महीना सबसे अच्छा माना जाता है।

कल्पेश्वर कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग – जोशीमठ, ऋषिकेश से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 268 कि.मी. की है। यहां से कल्पेश्वर की यात्रा की जा सकती है।

रेल मार्ग – ऋषिकेश रेल्वे स्टेशन की देहरादून से 42 कि.मी. और हरिद्वार से 23.8 कि.मी. की दूरी है। ऋषिकेश रेल माध्यम से पहुंचा जा सकता है, उसके बाद सड़क मार्ग की मदद से कल्पेश्वर जा सकते है।

सड़क मार्ग – जोशीमठ, ऋषिकेश से सड़क मार्ग से आसानी से कल्पेश्वर पहुंचा जा सकता है।

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