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निर्जला एकादशी व्रत का महत्व व पूजा करने की विधि

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निर्जला एकादशी जो हर साल ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष को मनाया जाता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी लोग जानते हैं। ऐसा मानना है कि इस एकादशी को ही भीमसेन ने धारण किया था, जिस वजह से इस एकादशी का नाम भीमसेनी एकादशी पडा। बता दें कि इस एकादशी के दिन व्रत व उपवास करने का विधान भी है।

निर्जला एकादशी व्रत क्यों है कठिन व्रत – 

ऐसा मानना है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को दीर्घायु और साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। निर्जला अर्थात जल के बिना रहना… इसी कारण इसे निर्जला एकादशी का नाम दिया गया है। यह व्रत बहुत कठिन व्रत होता है क्योंकि इस व्रत को निर्जल रखा जाता है अर्थात इस व्रत में जल का सेवन बिल्कुल भी नहीं किया जाता है।

बता दें कि इस एकादशी को करने से साल की 24 एकादशियों के व्रत के समान फल मिलता है। जान लें कि यह व्रत करने के पश्चात द्वादशी तिथि में ब्रह्मा बेला में उठकर स्नान, दान और साथ ही ब्राह्माण को भोजन ज़रूर कराना चाहिए। यही नहीं, इस दिन “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करके गौदान, वस्त्रदान, छत्र, फल आदि का भी दान करना चाहिए।

निर्जला एकादशी पूजा कैसे करें –

अगर आप निर्जला एकादशी का व्रत करना चाहते हैं तो इसके लिए दशमी तिथि से ही व्रत के नियमों का पालन शुरू कर देना होगा। ध्यान रखें, इस एकादशी में “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण ज़रूर करें। यही नहीं, इस दिन गौ यानि कि गाय का भी दान करने का विशेष महत्व होता है और व्रत करने के अतिरिक्त जप, तप गंगा स्नान आदि कार्य करना भी शुभ माना जाता है।

बता दें कि इस व्रत में सबसे पहले श्री विष्णु जी की पूजा कि जाती है और साथ ही व्रत कथा को बीसुना जाता है। पूजा पाठ के पश्चात सामर्थ अनुसार ब्राह्माणों को दक्षिणा, मिष्ठान आदि देना चाहिए संभव हो सके तो व्रत की रात्रि में जागरण भी ज़रूर से करना चाहिए।

निर्जला एकादशी व्रत कथा की पूरी जानकारी यहां –

दरअसल, महाभारत काल में भीमसेन ने व्यास जी से कहा की हे भगवान, युधिष्ठर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुन्ती तथा द्रौपदी सभी एकादशी के दिन व्रत किया करते हैं परंतु मैं भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैं दान देकर वासुदेव भगवान की अर्चना करके प्रसन्न कर सकता हूं… मैं बिना काया कलेश की ही फल प्राप्त करना चाहता हूं… अत: आप कृपा करके मेरी सहायता करें…

भीमसेन की इस मांग पर वेद व्याद जी कहते हैं कि – हे भीम अगर तुम स्वर्गलोक जाना चाहते हो, तो दोनों एकादशियों का व्रत बिना भोजन ग्रहण किए करो क्योंकि ज्येष्ठ मास की एकादशी का निर्जल व्रत करना विशेष शुभ माना जाता है। इस व्रत में आचमन में जल ग्रहण कर सकते है। अन्नाहार करने से व्रत खंडित हो जाता है। व्यास जी की आज्ञा अनुसार भीमसेन ने यह व्रत किया और वह पाप मुक्त हो गए।

निर्जला एकादशी व्रत का महत्व –

ऐसा मानना है कि मिथुन संक्रान्ति के मध्य ज्येष्ठ मास की शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जल व्रत किया जाता है। जान लें कि सूर्योदय से व्रत का अरंभ हो जाता है। वहीं, इसके अतिरिक्त द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले ही उठना चाहिए। इस एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान है। बता दें कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य अपने सभी पापों से मुक्ति पा लेता है। वहीं, जो मनुष्य़ निर्जला एकादशी का व्रत करता है उनको मृत्यु के समय मानसिक और शारीरिक कष्ट नहीं होता है। आप शायद नहीं जानते होंगे कि यह एकादशी पांडव एकादशी के नाम से भी जानी जाती है। इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति स्नान, तप और दान करता है, उसे करोडों गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है।

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