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कौन है नागा साधु, जानें इनके जीने का रहस्य!

कौन है नागा साधु, जानें इनके जीने का रहस्य

यह हम सभी जानते हैं कि हमारे भारत के चार प्रमुख तीर्थ स्थान हैं — प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन। इन चारों खास स्थान पर हर 12 साल के अंतराल में कुंभ मेले का आयोजन धूम-धाम से होता है।

वहीं, आस्था से जुड़े इस कुंभ मेले में अगर कोई आकर्षण का केन्द्र होता है तो वह होते हैं नागा साधु। अकसर हमारे मन में यह सवाल ज़रूर  आता है कि संन्यास परंपरा से आने वाले यह नागा साधू आखीर कहां से आते हैं और कुंभ का मेले खत्म होते ही कहां चले जाते हैं।

नागा साधुओं की रहस्मयी दुनिया के बारे में यहां जानें 

• ऐसी मान्यता है कि नागा साधु कभी भी आम मार्ग से नहीं जाते हैं बल्कि देर रात घने जंगल, आदि के रास्ते से अपनी यात्रा किया करते हैं।

• नागा साधुओं की ज़िंदगी हम आम इंसानों से कई गुणा कठिन होती है। यह लोग दीन-दुनिया से अमूमन दूर रहते हैं और तप-साधना में ही खुद को लीन रखते हैं।

• वहीं, संतों के 13 अखाड़ों में से सिर्फ 7 संन्यासी अखाड़े ही ऐसे हैं, जो नागा साधु बनाते हैं और इनमें जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा आदि शामिल हैं।

• बता दें कि नागा साधुओं को दीक्षा देने के बाद उनकी वरीयता के आधार पर पद दिए जाते हैं जैसे कि — कोतवाल, बड़ा कोतवाल, महंत, सचिव आदि।

• ध्यान रहे कि नागा साधुओं के अखाड़े से जुड़ा कोतवाल ही अखाड़ा और नागा साधुओं के बीच सेतु का काम करता है। सुदूर जंगल, कंदराओं आदि में रहने वाले इन नागा साधुओं को कुंभ में बुलाने का कार्य हो या फिर कोई सूचना पहुंचाने का काम हो… यह सारे काम कोतवाल करते हैं।

• क्या आप जानते हैं कि आम आदमी की तरह नागा साधु भी श्रृंगार करते हैं। सूर्योदय से पहले उठ जाने के बाद नित्यक्रिया और स्नान के बाद नागा साधु अपना श्रृंगार किया