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इस संसार में पहला मानव कौन था?

इस संसार में पहला मानव कौन था

हम सबने इस धरती पर एक मानव के रूप में जन्म लिया है, लेकिन क्या कभी हमने यह जाने की कोशिश की है कि आखिर इस सुंदर सी धरती पर पहला मानव कौन था? शायद ही कोई यह बात जानता होगा कि स्वायंभुव मनु को आदि भी कहा जाता है। आदि जिसका अर्थ होता है प्रारंभ। आपको बता दें कि इस आदि शब्द से ही आदम शब्द की भी उत्पत्ति हुई है। जहां एक ओर स्वायंभुव मनु की उत्पत्ति ब्रह्मा जी ने की थी तो वहीं, पुराणों में भी उनकी उत्पत्ति की कथा अलग-अलग तरीके से बताई गई है, जिससे भ्रम उत्पन्न होना लाज़मी है।

हालांकि इतना तो साफ तय है कि उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा से ही हुई थी। देखा जाए तो ब्रह्मा और मनु की परंपरा वाला धर्म अब भारत में नहीं पाया जाता है। यही नहीं, भारत में भी विष्णु और शिव सहित अन्य देवी और देवताओं की परंपरा से प्राप्त धर्म का पालन भी खूब होता है।

आज वेद संसार आपको विस्तार से बताने जा रहा है कि इस संसार में पहला मानव कौन था –

  • संसार के प्रथम पुरुष और कोई नहीं बल्कि स्वायंभुव मनु थे और प्रथम स्त्री थीं शतरूपा। बता दें कि भगवान ब्रह्मा ने जब 11 प्रजातियों और 11 रुद्रों की रचना की थी तब आखिरि में उन्होंने खुद को दो भागों में बांट लिया था। जहां पहले भाग का नाम उन्होंने ‘का’ रखा था तो वहीं, दूसरे भाग का नाम ‘या’ रखा था। यही नहीं, पहला भाग मनु के रूप में और दूसरा शतरूपा के रूप में प्रकट हुआ था। कहते हैं कि ब्रह्मा ने प्रजापतियों को प्रकाश से, रुद्रों को अग्नि से और स्वायंभुव मनु को मिट्टी से बनाया था।
  • हमारे हिंदू धर्म में स्वायंभुव मनु के ही कुल में आगे चलकर स्वायंभुव सहित क्रमश: 7 मनु हुए और 7 होना अभी बाकी ही है। महाभारत में 8 मनुओं का उल्लेख तो आसानी से मिलता है और वहीं, श्वेतवराह कल्प में 14 मनुओं का उल्लेख है। जान लें कि इन चौदह मनुओं को ही जैन धर्म में कुलकर कहा गया है।
  • आपकी जानकारी के लिए बता दें कि स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल पांच सन्ताने थीं, जिनमें से दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्याएं आकूति, देवहूति और प्रसूति थे।
  • एक ओर आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ हुआ तो दूसरी ओर प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ और देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। ये सभी प्राजापति ब्रह्मा के ही पुत्र थे।
  • जैसा कि हमने पहले बताया कि स्वायंभुव मनु के दो पुत्र- प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नी थीं। राजा उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव और सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे।
  • बता दें कि स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि दस पुत्र उत्पन्न हुए थे।
  • यही नहीं, प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत – ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने नामवाले मनवंतरों के अधिपति हुए
  • आश्चर्य वाली बात यह है कि महाराज प्रियव्रत के दस पुत्रों में से कवि, महावीर तथा सवन ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म को भी ग्रहण कर लिया था।
  • गौरतलब है कि महाराज मनु ने बहुत दिनों तक इस सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर राज्य किया था। जब महाराज मनु को मोक्ष की अभिलाषा हुई तब वह संपूर्ण राजपाट छोड़कर अपनी पत्नी शतरूपा के साथ नैमिषारण्य तीर्थ चले गए।
  • मनु ने सुनंदा नदी के किनारे लगभग सौ वर्ष तक तपस्या की थी। वहीं, दोनों पति-पत्नी ने नैमिषारण्य नामक पवित्र तीर्थ में गौमती के किनारे भी बहुत समय तक तपस्या की थी। बता दें कि उस स्थान पर दोनों की समाधियां बनी हुई है।
  • स्वायम्भु मनु के काल के ऋषि मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलह, कृतु, पुलस्त्य और वशिष्ठ हुए। राजा मनु सहित उक्त ऋषियों ने ही मानव को सभ्य, सुविधा संपन्न, श्रमसाध्य और सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया था।
  • बताते चलें कि राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीध्र जम्बूद्वीप के अधिपति हुए। अग्नीघ्र के नौ पुत्र जम्बूद्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृत वर्ष, भद्राश्व वर्ष, केतुमाल वर्ष, कुरु वर्ष, हिरण्यमय वर्ष, रम्यक वर्ष, हरि वर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भूभाग को नाभि खंड कहते हैं। नाभि और कुरु यह दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ था। भरत के नाम पर ही बाद में इस नाभि खंड को भारतवर्ष कहा जाने लगा।

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