धर्म ग्रंथ रामायण

भगवान श्रीराम को माता सीता से क्यों होना पड़ा था अलग… जानें क्या था श्राप!

रामायण एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें आपको एक आदर्श जीवन का सार व साथ ही एक मर्यादित जीवन जीने की सीख मिलेगी। इस ग्रंथ में अधिकार की बजाय कर्तव्यों पर ज्यादा जोर दिया गया है। यह हम सभी जानते हैं कि भगवान श्रीराम को माता सीता का वियोग सहना पड़ा था… लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह वियोग उन्हें एक श्राप के कारण ही सहना पड़ा था।

आपको जानकर हैरानी होगी कि यह श्राप और किसी ने नहीं बल्कि देव ऋषि नारद मुनि ने ही दिया था। इससे जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है… जिसे आज वेद संसार आपको विस्तार से बताने जा रहा है –

एकबार की बात है जब नारद मुनि को अपने ब्रह्मचर्य पर काफी अहंकार सा हो गया था और उन्होंने अपने इस अहंकार का बयान भगवान शिव के सामने खूब किया। उन्होंने महादेव के समक्ष यह कह डाला कि – “मेरा ब्रह्मचर्य इतना अटूट है कि इसे स्वयं कामदेव भी नहीं तोड़ पाएंगे…” इस पर भगवान शिव ने उनकी प्रशंसा की, परंतु उन्हें इस बात को लेकर भी चेताया कि इस बात को आप अभिमान में आकर भगवान विष्णु जी के सामने भूल से भी ना कहें।

भगवान शिव के समझाए जाने पर भी देवर्षि नारद उनकी बातों को नज़रअंदाज़ किया और वह भगवान विष्णु जी के सामने अपनी इस बात का गुणगान करने में जुट गए। जगत के पालनहार भगवान विष्णु उनके अहंकार को भलीभांती जान गए… फिर क्या उन्होंने उनके इस अहंकार को तोड़ने की रचना एक माया के रूप में रच डाली…

वहीं, जब नारद अपने प्रभु विष्णु से भेंट कर वापसी कर रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक सुंदर सा महल दिखा। उस महल में विश्वमोहिनी नाम की राजकुमारी के स्वयंवर की तैयारी ज़ोरो शोरो से चल रही थीं। जब नारद मुनि ने उस राजकुमारी के सुंदर रूप को देखा तो वह उस पर मोहित हो गए।

वह इस स्वयंवर में हिस्सा लेने के लिए व्याकल हो बैठे और एक अच्छा व सुंदर रूप की चाह करने लगे, जिसके लिए वह भगवान विष्णु जी के पास चल दिए और उन्होंने विष्णु जी से आग्रह करते हुए कहा कि – “हे प्रभु! मुझे हरि का रूप दे दीजिए… इस पर भगवान विष्णु जी ने कहा कि हे नारद! मैं आपको हरि का रूप तो दे दूं, लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि तुम उस रूप को लेकर पछताओ… बता दें कि नारद जी नहीं जानते थे कि हरि का एक रूप जो है वह वानर का भी है। नारद की अंहाकर को खत्म करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने वानर रूप को ही नारद को दे दिया…

दूसरी ओर, नारद इस बात से अनजान राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर में हिस्सा लेने जा पहुंचें। जब राकुमारी वरमाला लेकर सभा में उपस्थित हुई तो नारद के बंदर वाले मुख को देखकर ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी और उनके रूप का मज़ाक पूरी सभा में उड़ रहा था। नारद मुनि ने सोचा कि ऐसा क्या हुआ जो लोग मुझे देखकर इतना हंस रहे हैं और राजकुमारी मुझे वरमाला नहीं पहना रही है। तभी उस सभा में स्वयं विष्णु जी पधारे और राजकुमारी ने उन्हें अपना वर चुन लिया।

बस यह देखकर नारद मुनि को बेहद आश्चर्य सा हुआ। उन्होंने पहले तो अपना चेहरा पानी में देखा… अपना बंदरवाला चेहरा देखकर वह बहुत ज्यादा क्रोधित हो ऊठे और ऐसे में उन्होंने क्रोध में आकर विष्णु जी को ये श्राप दे दिया कि – “जिस तरह से मैं स्त्री के लिए तड़पा हूं… वैसे ही आप धरती पर अपनी स्त्री के वियोग में तड़पेंगे और उस समय वानर ही आपकी मदद करेंगे…”

इधर जब भगवान विष्णु की माया का प्रभाव खत्म हो गया तो देवर्षि को अपनी गलती का अहसास हुआ… फिर उन्होंने तुरंत ही भगवान विष्णु जी से दोनों हाथ जोड़कर क्षमा मांगी।

इसलिए दोस्तों, जब भगवान विष्णु ने धरती पर प्रभु श्रीराम के रूप में जन्म लिया तो उन्हें इसी श्राप के कारण माता का वियोग सहना पड़ा था।

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