धर्म ग्रंथ महाभारत

भीष्म ने युधिष्ठिर को मरने से पहले बताए थे कौन से सीख?

महाभारत में भीष्म पितामाह तो आपको याद ही होंगे… पितामाह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था और इसी कारण तीरों की शैय्या पर होने के बावजूद वह कई दिनों तक जीवित रहे थे। हालांकि मरने से पहले उन्होंने दुर्योधन को काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन दुर्योधन ने उनकी एक ना सुनी। गौरतलब है कि पितामाह के मृत्यु की शैय्या पर लेटे होने के बावजूद आठ दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा था।

युद्ध खत्म होने के बाद युधिष्ठिर की ग्लानि और पश्चाताप को दूर करने के लिए भीष्म ने राजधर्म, मोक्षधर्म और साथ ही आपद्धर्म के बहुमूल्य उपदेश उन्हें दिए थे। यह खास उपदेश हमारे जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

आज वेद संसार आपको वही बहुमूल्य उपदेश बताने जा रहा है, जो पितामाह भीष्म ने युधिष्ठिर को बताए थे… आप इन्हें जानें, समझें और अपने जीवन में फॉलो भी करें –

• कटु वचन कहने से बचें व मन को रखें वश में –

इंसान का मन सबसे चंचल होता है और जो व्यक्ति अपने मन को काबू पर कर लेता है, उसकी हार कभी नहीं होती है। इसलिए पितामाह भीष्म ने कहा था कि मन को सदैव वश में ही रखना चाहिए और साथ ही खुद से अहंकार को भी कोसो दूर रखना चाहिए। कभी कोई आपसे कटु वचन कह भी दें, तो आप खुद को चुप ही रखें और उसे कुछ ना कहें। घर आए मेहमान और ज़रूरतमंदों को हमेशा आश्रय दें। यही नहीं, ना तो कभी आप दूसरों की निंदा करें और ना ही सुनें।

• दूसरों का सम्मान करें व स्वास्थ्य के लिए करें भोजन –

कभी कोई आप पर हाथ उठाए या मारे तो आप शांत रहें। वहीं, शास्त्रों को भी हमेशा नियम पूर्वक सुनना और पढ़ना चाहिए। दिन के समय कभी नहीं सोना चाहिए और क्रोध से दूरी बनाए रखनी चाहिए। सदैव दूसरों का सम्मान करें चाहे बदले में आपको कोई सम्मान ना भी दें। और तो और भोजन कभी भी स्वाद के लिए नहीं, बल्कि खुद के स्वास्थ के लिए करना चाहिए।

• सत्य कहे और साथ भी सत्य का दें –

किसी ने कहा है कि सत्य ही सनातन धर्म है। यह हमारे सभी धर्मों से उत्तम माना जाता है। सत्य से ही तप और योग की उत्पत्ति हुई है। जहां एक ओर सत्य मनुष्य को स्वर्ग ले जाता है तो वहीं, झूठ हमें अंधकार की तरफ ले जाता है। जान लें कि यहां पर प्रकाश का अर्थ स्वर्ग है तो नरक का अर्थ अंधकार है।

• मोह व इच्छाओं का करें त्याग –

अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए रात-दिन एक करना व साथ ही सबकुछ त्याग देना अच्छी बात है, क्योंकि सत्य यह भी है कि त्याग के बिना आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते। याद रखें कि त्याग से मनुष्य को परम सुख की अनुभूति तो होती ही है व इसी के साथ आपकी चित्त को शांति भी मिलती हैं।

• ईष्या और आलस्य से रहे कोसो दूर –

ऐसे कई लोग होते हैं जो किसी और का सुख व धन को देखकर मन ही मन ईर्ष्या करते हैं। ध्यान रहें कि विद्वानों का आदर करने वाले हमेशा सुखी रहते हैं और साथ ही आलस्य ना करने वाले मनुष्य सुख के भागी बनते हैं।

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