महाभारत

महाभारत: विकर्ण ने अपने ही भाईयों के खिलाफ लड़ी थी जंग

महाभारत के युद्ध में शामिल एकमात्र ऐसा कौरव था जिसने आजीवन धर्म का साथ दिया उसका नाम है विकर्ण। एक ओर जहां प्रत्येक कौरव अधर्मी होकर अपने ही परिवार के विरुद्ध षडयंत्र रच रहा था वहीं, विकर्ण ऐसा कौरव था जिसने अपने अन्य भाइयों के विरुद्ध जाकर धर्म स्थापना के लिए अपनी ओर से पूरी कोशिश की।
हालांकि धर्म की राह पर चलते हुए विकर्ण ने सत्ता और शक्ति के नशे में चूर अपने अधर्मी भाइयों को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह अपने भाईयों के क्रोध की ज्वाला को शांत करने में नाकामयाब साबित हुए। इसके परिणामस्वरूप महाभारत के युद्ध में विकर्ण समेत सभी कौरव मारे गए जिनके रक्त से कुरुक्षेत्र की भूमि लाल हो गई।
विकर्ण को किया गया नज़रअंदाज़ –
यूं तो जब भी कौरवों की बात आती है तो ज्यादातर दुर्योधन या दुःशासन का ही नाम लिया जाता है। बता दें कि विकर्ण जो थे वह कौरवों के तीसरे भाई थे। विकर्ण की अस्त्र और शस्त्र शिक्षा कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और स्वयं भीष्म की देखरेख में संपन्न हुई थी लेकिन महाभारत में महत्वपूर्ण स्थान ना देकर ज्यादातर लेखों में उन्हें नजरअंदाज ही किया गया है।

विकर्ण – एक महान योद्धा
भागवत गीता में विकर्ण को एक महान योद्धा के तौर पर दर्शाया गया है। भागवत गीता के अनुसार अगर कौरव सेना में कर्ण और अश्वत्थामा के अलावा कोई महान धनुर्धर था तो वो था विकर्ण। गौरतलब है कि महाभारत में अर्जुन, एकलव्य, अश्वत्थामा, कर्ण और अर्जुन की उपस्थिति के चलते विकर्ण को हमेशा अलग ही रखा गया। द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब उन्हें गुरु दक्षिणा का समय आया तब कौरवों ने उनसे पूछा कि गुरु द्रोण को गुरु दक्षिणा के एवज में क्या चाहिए? गुरु दक्षिणा में द्रोणाचार्य ने कौरवों से कहा कि वे द्रुपद के राज्य पर हमला कर उसका राजपाट छीनकर उन्हें सौंप दें। गुरु के निर्देशानुसार कौरवों ने द्रुपद पर आक्रमण तो किया लेकिन द्रुपद की सेना के आगे उनकी बड़ी हार हुई। इस युद्ध में विकर्ण भी शामिल था जिसने हर संभव प्रयत्न कर गुरु द्रोण की इच्छा पूरी करनी चाही थी।

विकर्ण ने उठाई थी अपने भाईयों के खिलाफ आवाज़ –
जान लें कि विकर्ण एकमात्र ऐसा कौरव था जिसने ना सिर्फ अपने ज्येष्ठ भ्राता की इस हरकत के खिलाफ आवाज उठाई बल्कि अंत तक दुर्योधन और दुशासन को समझाने का प्रयास भी करता रहा कि ऐसा करना अधर्म होगा। हालांकि विकर्ण के ये सभी प्रयास विफल हो गए लेकिन इससे एक बात प्रमाणित हो गई कि गांधारी के गर्भ से केवल अधर्मी ही नहीं बल्कि धर्म की राह पर चलने वाले पुत्र ने भी जन्म लिया था।
महाभारत के युद्ध के चौदहवें दिन अर्जुन जयद्रथ को मारना चाहता था, भीम भी अपने भाई की सहायता करने के द्रोण द्वारा भेजे गए सकटवाहु का वध करने के लिए निकल गया। इसी दौरान दुर्योधन ने भीम की हत्या का दायित्व विकर्ण को सौंप दिया। चीरहरण के दौरान द्रौपदी का सम्मान बचाने की कोशिश करने वाले कौरव, विकर्ण को मारने की चेष्टा भीम नहीं करना चाहता था। भीम ने विकर्ण से कहा भी कि वे इस युद्ध से खुद को अलग कर ले, लेकिन विकर्ण ने ऐसा नहीं किया।

विकर्ण की मृत्यु भीम के हाथों –
महाभारत युद्ध के दौरान विकर्ण ने भीम से कहा कि चीरहरण के समय अपने भाई की पत्नी के सम्मान को बचाना उसका दायित्व था और अब युद्ध में अपने भाई का साथ देना भी उसका धर्म है। वह अपने धर्म का साथ दे रहा है इसलिए भीम को भी धर्म का ही साथ देकर उसके साथ युद्ध करना चाहिए। फिर क्या ना चाहते हुए भी भीम ने विकर्ण की बात मान ली, दोनों में युद्ध हुआ जिसमें भीम ने विकर्ण का वध कर दिया।

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