धर्म ग्रंथ महाभारत

दुर्योधन का यह 101वां भाई कौन था

दुर्योधन का यह 101वां भाई कौन था

महाभारत  को हिंदू धर्म का सबसे प्रमुख ग्रंथों में से एक माना जाता है, जिसमें आपको कई रोचक किरदार पढ़ने को मिलेंगे। महाभारत में कौरवों की संख्या 100 हैै हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुर्योधन के 100 नहीं बल्कि 101 भाई थे??? दरअसल, अपने 101वें भाई को दुर्योधन ने कभी अपना भाई समझा ही नहीं, क्योंकि वह गांधारी के गर्भ से नहीं बल्कि उनकी दासी के गर्भ से पैदा हुआ था। आपको जानकर हैरानी होगी कि महाभारत जैसे भिष्ण युद्ध में वही सिर्फ जीवित बचा था और उसने ही सबको अर्धम के रास्ते को छोड़कर धर्म के रास्ते को अपनाने की बात भी कही थी। वह कौरवों मेंं एकलौता शख्स था जो कभी नहीं चाहता था कि कौरवों और पांडवों में युद्ध छिड़ें।

दुर्योधन का यह 101वां भाई कौन था –

महाभारत के प्रमुख पात्र ध़ृतराष्ट्र चाहते थे कि उनके घर पाण्डु से पहले पुत्र पैदा हो ताकि राज तिलक सबसे पहले उसी का हो। भला विधि के विधान को कौन रोक सका है… गांधारी से पहले ही कुंती ने पुत्र को जन्म दे दिया था। ऐसे में धृतराष्ट्र पुत्र के वियोग में रहने लगे और गांधारी की दासी से ही संबंध बना लिए, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई युयुत्सु। गौरतलब है कि दुर्योधन ने कभी युयुत्सु को अपना भाई स्वीकार नहीं किया और हमेशा उसका अपमान किया करता था।

युयुत्सु कब और क्यों जा मिले पांडवों से???

महाभारत युद्ध को युयुत्सु बहुत रोकना चाहते थे, लेकिन उनके लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें सफलता कभी हाथ नहीं लग सकी। युद्ध से पहले युधिष्ठिर ने यह साफ साफ कहा कि कौरव सेना के योद्धा जो भी हमारे तरफ आना चाहते हैं वह बेझिझक हमारी ओर आ सकते हैं, हम उनका स्वागत दिल खोलकर करेंगे औऱ साथ ही, जो भी योद्धा हमारी सेना को छोड़कर कौरवों की सेना में शामिल होना चाहते हैं वह भी बिना किसी पछतावे के उनसे जाकर मिल सकते हैं, क्योंकि हम उनका भी सम्मान बराबर करेंगे।

युधिष्ठिर के इस खास घोषणा के बाद सिर्फ वह शख्स युयुत्सु ही थे, जिनका विवेक सही समय पर काम किया और वह बिना देर किए हुए पांडवों से जा मिलें। फिर क्या बस इस घटना को देखकर दुर्योधन ने युयुत्सु के इस फैसले पर काफी क्रोध जताया। यही नहीं, उन्होंने तो युयुत्सु को कायर और दासी का पुत्र तक कह डाला।

वहीं, दूसरी ओर युधिष्ठिर ने पांडवों में शामिल हुए युयुत्सु के प्राणों की रक्षा का ध्यान देते हुए, उन्हें युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं किया बल्कि उनकी बुद्धि कौशल और प्रबंधन क्षमता का प्रयोग अच्छे से किया। युयुत्सु ने भी अपनी ज़िम्मेदारियों को बहुत अच्छे से निभाया और पांडवों का साथ बखूबी दिया। अपनी बुद्धि और सच का साथ देते हुए उन्होंने कभी पांडवों को हथियार की कमी होने का एहसास नहीं होने दिया।

युधिष्ठिर ने भी युयुत्सु की सच्ची लगन और सत्य का साथ निभाने का जज़्बा देखा और महाभारत युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद भी उन्होंने युयुत्सु को महामंत्री का पद प्रदान किया था और उनका साथ नहीं छोड़ा।

Leave a Comment