धर्म ग्रंथ महाभारत

द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में क्यों मांग लिया था अंगुठा

द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में क्यों मांग लिया था अंगुठा

महाभारत युद्ध को भला कौन भूल सकता है… यह वह युद्ध है, जो कुरुक्षेत्र की पावन धरती पर कौरवों और पांडवों के बीच हुआ था। महाभारत में वैसे तो कई किरदार मौजूद थे और सबका एक अहम रोल था। ऐसे ही एक अहम रोल की बात करने जा रहा वेद संसार और वह अहम किरदार है एकलव्य…

एकलव्य कौन था

एकलव्य को लगन के साथ खुद से सीखी गई धनुर्विद्या और साथ ही गुरुभक्ति के लिए जाना जाता है। अपने पिता के मौत के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बना था।

जहां एक ओर एकलव्य को लोग शिकारी का पुत्र कहते हैं और वहीं, कुछ लोग भील का पुत्र। एक बार की बात है जब एकलव्य धनुर्विद्या सीखने की चाह लिए द्रोणाचार्य के आश्रम आ पहुंचे, लेकिन निषादपुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। द्रोणाचार्य के मना कर देने से एकलव्य निराश होकर वन में चले गए और वहां उसने द्रोणाचार्य की मुर्ति बनाई और उस मुर्ति को गुरु मानकर वह धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुए अल्पकाल में ही वह धनुर्विद्या में अत्यंत निपुर्ण होता चला गया।

एकलव्य का धनुर्कौशल देख द्रोणाचार्य हुए आश्चर्यचकित

एक दिन की बात है जब पाण्डव और कौरव गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिए उसी वन में आ पहुंचे जहां पर एकलव्य अपनी धनुर्विद्या का अभ्यास किया करता था। उधर राजकुमार का कुत्ता रास्ता भटकर एकलव्य के आश्र्म में आ पहुंचा और एकललव्य को देख ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य को साधना करने में परेशानी हो रही थी तो ऐसे में उसने अपने बाणों के जरिए कुत्ते का मुंह बंद कर दिया। दिलचस्प बात यह थी कि एकलव्य ने इस प्रकार से बाण चलाए थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी।

कुत्ते के लौटने पर कौरव, पांडव और खुद द्रोणाचार्य यह धनुर्कौशल देखकर दंग रह गए और बाण चलाने वाले की खोज करते हुए एकलव्य के पास आ पहुंचे। द्रोणाचार्य यह देख आश्चर्य में पड़ गए कि एकलव्य ने उनको मानस गुरु मानकर स्वयं अभ्यास करके विद्या प्राप्त की है।

एकलव्य ने जब अपना अंगूठा काटकर द्रोणाचार्य को दिया

एकलव्य ने जब अपना अंगूठा काटकर द्रोणाचार्य को दिया

कहते हैं कि एकलव्य ने गुरुदक्षिणा के रूप में अपना अंगूठा काटकर द्रोणाचार्य को दे दिया था। लोगों की मानें तो इसके पीछे का अर्थ यह है कि एकलव्य को अतिमेधावी जानकर द्रोणाचार्य ने उसे बिना अंगूठे के धनुष चलाने की विशेष विद्या का दान किया हो।

दरअसल द्रोणाचार्य ने भीष्मपितामह को वचन दिया था कि वे कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे और अर्जुन को वचन दिया था कि तुमसे बड़ा कोई धनुर्धर नहीं होगा। गुरु द्रोणाराचार्य ने यह नहीं कहा था कि मैंने किसी शूद्र को शिक्षा नहीं देने का वचन दिया है। लेकिन इस घटना को कुछ लोगों के समूह ने गलत अर्थो में लिया और उस अर्थ को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन किया।

ऐसी मान्यता है कि अंगूठा कट जाने के बाद एकलव्य ने तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग कर तीर चलाने लगा। बस यहीं से तीरंदाजी करने के आधुनिक तरीके का जन्म हुआ।

इन दिनों तीरंदाज एक अहम खेल में शामिल हो गया है। छोटे-छोटे शहर व गांव से लड़कियां और लड़के भी बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं और ढेर सारे पदक भारत के नाम कर देश का नाम रोशन करते हैं। महाभारत से चला आ रहा यह खास खेल आज लोगों के लिए उनका करियर बन गया है, जिससे वह नाम, लोकप्रियता और साथ ही ढेर सारे पैसे भी खूब कमा रहे हैं।

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