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विजया एकादशी का महत्व और पूजा विधि

विजया एकादशी का महत्व और पूजा विधि

हमारे हिंदू धर्म में एकादशी तिथि खास महत्व रखती है। बता दें कि इसे समस्त पापों का हरण करने वाली तिथि भी माना जाता है। यही नहीं, यह अपने नाम के अनुरूप फल भी देती है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी ही विजया एकादशी कहलाती है। इस शुभ दिन व्रत धारण करने से व्यक्ति को अपनी मनवांछित फल की प्राप्ति तो होती है व साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में आपको विजय भी प्राप्त होती है।

विजया एकादशी पर करें श्री नारायण का ध्यान

शास्त्रों की मानें तो इस दिन व्रत करने से आपको स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्न दान और गौ दान से अधिक पुण्य की प्राप्ति हो सकती है। याद से इस दिन भगवान श्री नारायण की उपासना ज़रूर करें। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विजया एकादशी व्रत की पूजा में सप्त धान रखने का विधान माना गया है। वहीं, पूजा से पूर्व एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान भी रखें।

यही नहीं, वेदी पर जल कलश स्थापित कर, आम या अशोक के पत्तों से उसे सजाएं। इस वेदी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर भी स्थापित करें। पीले पुष्प, ऋतुफल, तुलसी आदि अर्पित कर धूप-दीप से आरती याद से उतारें और व्रत की सिद्धि के लिए घी का एक अखंड दीपक अवश्य जलाएं।

विजया एकादशी का व्रत कर श्रीराम ने पायी थी विजय

विजया एकादशी का व्रत कर श्रीराम ने पायी थी विजय

दरअसल, यह उस वक्त की बात है जब भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता को रावण द्वारा अपहरण कर लेने पर लंका से छुड़ाने जा रहे थे। तभी वह ऋषि के पास पहुंचे और उस ऋषि ने उन्हें पहचान लिया कि यह तो भगवान विष्णु का ही एक रूप है… रामचंद्र जी ने उस ऋषि से कहा कि -‘हे ऋषि! मैं अपनी सेना सहित राक्षसों को जीतने लंका जा रहा हूं, कृपया आप समुद्र पार करने का कोई उपाय बताइए।’

ऐसे में ऋषि बोले – ‘हे राम, फाल्गुन कृष्ण पक्ष में जो ‘विजया एकादशी’ आती है, उसका व्रत करने से आपकी निश्चित विजय होगी और आप अपनी सेना के साथ समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे।’

फिर क्या मुनि के कहने पर भगवान श्रीराम विजया एकादशी के खास दिन विधिपूर्वक व्रत करते हैं। आपको बता दें कि इस व्रत को करने से भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय पायी और माता सीता को वापस प्राप्त भी कर लिया।

विजयी एकादशी पर जौ-चावल खाना अशुभ

शास्त्रों में एक और बात का ज़िक्र किया गया है कि एकादशी के दिन चावल और जौ का सेवन वर्जित होता है। पौराणिक मान्यता की मानें तो माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर का त्याग कर दिया था और उनका अंश पृथ्वी में ही समा गया, और यह दिन एकादशी तिथि ही थी।

वहीं, चावल और जौ के रूप में मेधा ऋषि उत्त्पन्न हुए, इसलिए चावल और जौ को जीव माना गया है। कहते हैं कि एकादशी के दिन चावल खाना, महर्षि मेधा के मांस और रक्त का सेवन करने के जैसा माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन खान-पान एवं व्यवहार में सात्विकता का पालन करना बहुत आवश्यक माना गया है और साथ ही श्री हरि का स्मरण करना भी श्रेष्ठ होता है ।

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