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वरूथिनी एकादशी क्या है, जानें व्रत कथा और नियम!

वरूथिनी एकादशी क्या है, जानें व्रत कथा और नियम

हमारे शरीर का सेहत चक्र दुरुस्त करने वाला व्रत एवं उपवासों का सनातन धर्म में बड़ा ही महत्व माना जाता है। यूं तो हर व्रत की अपनी अलग महिमा होती है और उसके फल केवल जीवनकाल में सांसारिक ना होकर परलोक तक मिलते हैं। वहीं, ऐसे ही व्रतों में से एक है वरूथिनी एकादशी का व्रत, जो वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है।

बता दें कि इस व्रत को सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत भी माना जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के वाराह अवतार की पूजा अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इस व्रत को रखने वाले मनुष्यों के भगवान सारे कष्ट हर लेते हैं और उन्हें सुख समृद्धि प्रदान करते हैं। ध्यान रहे कि वरूथिनी एकादशी का व्रत सौभाग्य प्रदान तो ज़रूर करते हैं, लेकिन इस व्रत को नियमानुसार रखा जाना बहुत आवश्यक होता है, क्योंकि तभी व्रत रखने वाले व्यक्ति को मनवांछित फल प्राप्त की प्राप्ति होती है।

वरूथिनी एकादशी व्रत के नियम

गौरतलब है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत धारण करने से एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि से ही उपवास रखने वाले व्यक्ति को सारे नियमों का पालन करना पड़ता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसे दस नियम हैं, जिनका पालन दशमी को करना होता है, क्योंकि एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी को रात का भोजन करने के बाद ही शुरू हो जाती है। जबकि इस व्रत का समापन द्वादशी को सुबह ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान दक्षिणा देने के बाद होता है।

जो व्यक्ति इस खास व्रत को रखता है उसे मांस, मसूर की दाल, चना, करौंदे, शाक, शहद गलती से भी नहीं खाना चाहिए। कांसे के बर्तन में, मांगकर और दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन में नमक का प्रयोग बिल्कुल भी ना करें। अगर संभव हो तो व्रत रहने के दौरान भगवान विष्णु की प्रतिमा के पास धरती पर ही सो जाए।

वरूथिनी व्रत ऐसे करें धारण –

अगर आप भी वरूथिनी एकादशी का व्रत धारण करना चाहते हैं, तो सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें और फिर उपवास रखने का संकल्प करें। अब इसके बाद भगवान श्री हरि विष्णु भगवान की पूजा सच्चे दिल से करें। घड़े पर लाल रंग का वस्त्र बांधकर, उस पर भगवान श्री विष्णु जी की पूजा, धूप, दीप और पुष्प से ज़रूर करें। कहते हैं इससे जातक को अच्छे फल की प्राप्ति होती है।

वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा –

दरअसल, प्राचीन समय में नर्मदा नदी के किनारे मान्धाता नाम के राजा हुआ करते थे। राजा का धर्म निभाने के साथ ही वह जप तप भी किया करते थे। साथ ही साथ प्रजा के प्रति दयाभाव भी रखते थे। एक बार वह तपस्या में लीन थे कि अचानक एक भालू ने उनका पैर चबा लिया और राजा को जंगल की ओर खींचकर ले गया। तब राजा ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। भक्त की पुकार सुनकर विष्णु भगवान वहां आ पहुंचे और अपने चक्र से भालू को मार डाले…

वहीं, राजा का पैर भालू ने नोचकर खा लिया था। इस बात का राजा को बहुत दुख हुआ था। राजा को दुखी देखकर विष्णु भगवान ने कहा कि राजन भालू ने जो तुम्हारा पैर काटा है… वह तुम्हारे पूर्व जन्म का कोई पाप है, जिसकी सजा तुम्हें इस जन्म में भुगतनी पड़ रही है। राजा ने इससे मुक्ति पाने का उपाय पूछा तो भगवान विष्णु ने साफ कहा कि – “राजन, तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा वरूथिनी एकादशी का व्रत धारण करो, इससे तुम्हारे सारे पाप कट जाएंगे और व्रत के प्रभाव से दोबारा अंगों वाले हो जाआगे।” इसके बाद राजा ने वरुथिनी एकादशी का व्रत धारण किया तो उनका पैर सच में फिर से सही हो गए।

वरूथनी एकादशी देती है श्रेष्ठ दान का फल –

ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को धारण करने से इस लोक के साथ-साथ परलोक में भी सुख की प्राप्ति आसानी से हो जाती है। लोगों का कहना है कि घोड़े के दान से हाथी का दान करना श्रेष्ठ होता है, हाथी के दान से भूमि का दान श्रेष्ठ होता है और इन सभी में श्रेष्ठ तिलों का दान करना है। सोने का दान तिल के दान से भी श्रेष्ठ है। और तो और सोने के दान से श्रेष्ठ अन्न-दान को माना जाता है। याद रखें कि अन्न-दान से श्रेष्ठ कोई भी दान नहीं कहलाता है।

अन्न-दान से मानव, देवता, पितृ सभी को तृप्ति की प्राप्ति होती है। यही नहीं, शास्त्रों के अनुसार कन्यादान को भी अन्न दान के बराबर ही माना जाता है।

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