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महाशिवरात्री 2020: भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए मां पार्वती ने कहां किया था कठोर तप?

भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए मां पार्वती का तप

हमारे हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का महत्व बहुत अधिक है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है और धार्मिक मान्यताओं की मानें तो इस दिन भगवान शिव की पूजा अर्चना करने से व्यक्ति की हर मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इस दिन व्रत रखने का भी महत्व माना गया है। इस साल यानी कि 2020 में महाशिवरात्रि 21 फरवरी को मनाया जाएगा।

आज वेद संसार महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर आपको बताने जा रहा है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए मां पार्वती ने कहां किया था कठोर तप –

बता दें कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। ऐसी मान्यता है कि जिस स्थान पर देवी पार्वती ने तपस्या की थी वह खास स्थान है केदारनाथ के पास स्थित गौरी कुंड। जी हां, गौरी कुंड की खूबी यह है कि यहां का पानी सर्दी में भी गर्म रहता है। तपस्या पूरी होने के बाद गुप्तकाशी में देवी पार्वती ने भगवान शिव के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया था और जब भगवान शिव ने विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तब देवी पार्वती के पिता हिमालय ने विवाह की तैयारियां ज़ोरो-शोरों से शुरु कर दिया था और उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में इनकी शादी धूमधाम के साथ हुई थी।

भगवान शिव-पार्वती का विवाह स्थल

रुद्रप्रयाग जिले का एक गांव त्रिर्युगी नारायण भी है। कहते हैं कि इसी गांव में भगवान शिव का देवी पार्वती के साथ विवाह हुआ था। यही नहीं, इस गांव में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित एक मंदिर है, जिसे शिव पार्वती के विवाह स्थल के रूप में जाना जाता है। और तो और इस मंदिर के प्रांगण में कई चीजें हैं जिनकें बारे में बताया जाता है कि यह शिव पार्वती के विवाह प्रतीक हैं।

भगवान शिव और पार्वती के विवाह में ब्रह्मकुंड का भी बहुत अहम भूमिका रही थी। दरअसल, भगवान शिव और पार्वती के विवाह में ब्रह्मा जी पुरोहित बने थे। विवाह में शामिल होने से पहले ब्रह्मा जी ने जिस कुंड में स्नान किया था वह ब्रह्मकुंड कहलाता है। तीर्थयात्री अब इसी कुंड में स्नान करके ब्रह्मा जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

शिव-पार्वती के विवाह में किसने निभाई थी भाई की भूमिका –

शिव-पार्वती के विवाह में भगवान विष्णु ने देवी पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी। भगवान विष्णु ने उन सभी रीतियों को निभाया था, जो एक भाई अपनी बहन के विवाह में करता है। और इसी कारण यहां मौजूद है विष्णु कुंड क्योंकि इसी कुंड में स्नान करके भगवान विष्णु ने विवाह संस्कार में भाग लिया था।

अब बात करते हैं रुद्र कुंड की जहां भगवान शिव के विवाह में भाग लेने आए सभी देवी-देवताओं ने स्नान किया था। इन सभी कुंडों में जल का स्रोत सरस्वती कुंड को माना जाता है।

यहां त्रिर्युगी नारायण मंदिर की अखंड धुनी भी मौजूद है। कहते हैं कि भगवान शिव ने इसी कुंड के चारों तरफ देवी पार्वती के संग फेरे लिए थे। आज भी इस कुंड में अग्नि को जीवित रखा गया है। मंदिर में प्रसाद के रूप में लकड़िया भी चढ़ाई जाती है। श्रद्धालु इस पवित्र अग्नि कुंड की राख अपने घर ले जाते हैं और लोगों की मानें तो यही राख वैवाहिक जीवन में आने वाली परेशानियों को दूर भी कर देता है।

मां पार्वती से विवाह करने पर भगवान शिव को क्या मिली थी

भगवान शिव को अपने विवाह में एक गाय मिली थी। इस स्तंभ को निशानी के तौर पर जाना जाता है और इसमें गाय बंधी गई थी।

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